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ED ने रांची-गोरखपुर से चल रहे साइबर ठगी नेटवर्क की 3.72 करोड़ की संपत्ति कुर्क की

ED ने बुजुर्गों को साइबर ठगी में फंसाकर UK से भारत तक बिछाए गए नेटवर्क के तहत 3.72 करोड़ की संपत्ति कुर्क की।

N NewsDeskसत्यापित पत्रकार एडिटर 7 मिनट में पढ़ें
ED ने रांची-गोरखपुर से चल रहे साइबर ठगी नेटवर्क की 3.72 करोड़ की संपत्ति कुर्क की

ब्रिटेन के बुजुर्ग नागरिकों को इंटरनेट की स्पीड बढ़ाने और साइबर हमले से बचाने का झांसा देकर कथित तौर पर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। ईडी ने इस मामले में आरोपियों की करीब 3.72 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियां अस्थायी रूप से कुर्क की हैं। कुर्क की गई संपत्तियों में कोलकाता स्थित एक फ्लैट, एक भूखंड, बैंक खातों में जमा धनराशि और बीमा पॉलिसियां शामिल हैं। जांच एजेंसी के मुताबिक, इस नेटवर्क के जरिए कथित तौर पर करीब सात करोड़ रुपये की अपराध से अर्जित आय जुटाई गई थी।

यह मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि इसमें भारत में संचालित कथित फर्जी कॉल सेंटरों के जरिए ब्रिटेन के नागरिकों, खासकर बुजुर्गों को निशाना बनाया गया। जांच के अनुसार, आरोपियों ने भरोसेमंद कंपनियों और धोखाधड़ी की शिकायतों की जांच करने वाली एजेंसी के प्रतिनिधि बनकर लोगों से संपर्क किया। इसके बाद इंटरनेट सुरक्षा से जुड़ी समस्या का डर दिखाकर उनसे पैसे ट्रांसफर कराए गए।

रांची से गोरखपुर तक कैसे फैला कथित साइबर ठगी का नेटवर्क?

ईडी की जांच के अनुसार, इस मामले में कथित तौर पर दो कंपनियों के माध्यम से फर्जी कॉल सेंटर संचालित किए गए। शुरुआत में झारखंड की राजधानी रांची में स्थित ग्लोबर्ड कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड के जरिए गतिविधियां चलाई गईं। बाद में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जुबिलेट इंफो प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से कॉल सेंटर संचालित किए जाने की बात सामने आई।

जांच एजेंसी का आरोप है कि इन कॉल सेंटरों में काम करने वाले कर्मचारियों को ब्रिटेन के नागरिकों से संपर्क करने और उन्हें इंटरनेट सेवाओं से जुड़ी समस्याओं के नाम पर भरोसे में लेने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। आरोपी कथित तौर पर अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर विदेशी नामों का इस्तेमाल करते थे।

इस नेटवर्क का निशाना मुख्य रूप से ब्रिटेन के बुजुर्ग नागरिक थे। उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता था कि फोन करने वाले कर्मचारी उनकी इंटरनेट सेवा में सुधार करने या उनके डिजिटल उपकरणों को सुरक्षित बनाने में मदद कर सकते हैं।

इंटरनेट की स्पीड बढ़ाने के बहाने ठगी का आरोप

जांच में सामने आए कथित तरीके के अनुसार, गिरोह के सदस्य खुद को ब्रिटेन की दूरसंचार कंपनी बीटी ओपनरीच का प्रतिनिधि बताते थे। वे लोगों को इंटरनेट की धीमी गति या कनेक्शन में संभावित समस्या का हवाला देकर बातचीत में उलझाते थे।

इसके बाद पीड़ितों को कंप्यूटर या अन्य उपकरणों पर रिमोट एक्सेस देने वाले सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने के लिए कहा जाता था। ईडी के अनुसार, इस काम में AnyDesk और Quick Assist जैसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया।

ऐसे सॉफ्टवेयर का वैध उपयोग तकनीकी सहायता देने के लिए भी किया जाता है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति धोखे में आकर अनजान व्यक्ति को अपने डिवाइस का नियंत्रण दे देता है, तो उसकी निजी जानकारी और वित्तीय सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

जांच एजेंसी का आरोप है कि इसी तरीके से पीड़ितों के उपकरणों और बैंकिंग संबंधी जानकारी तक पहुंच बनाई गई। इसके बाद कथित ठगी को अगले चरण में पहुंचाया जाता था।

साइबर हमले का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर कराने का आरोप

ईडी के मुताबिक, कथित ठगी केवल इंटरनेट की समस्या बताने तक सीमित नहीं थी। इसके बाद पीड़ितों को बताया जाता था कि उनके इंटरनेट कनेक्शन पर साइबर हमला हुआ है और इस संबंध में ब्रिटेन की धोखाधड़ी रिपोर्टिंग सेवा एक्शन फ्रॉड में मामला दर्ज किया गया है।

आरोप है कि कॉल सेंटर के वरिष्ठ कर्मचारी खुद को एक्शन फ्रॉड के अधिकारी बताकर पीड़ितों से संपर्क करते थे। वे कथित तौर पर उन्हें यह विश्वास दिलाते थे कि उनके बैंक खातों से जुड़ी कोई गंभीर समस्या है और धनराशि को सुरक्षित रखने के लिए बताए गए खातों में ट्रांसफर करना जरूरी है।

इस तरह तकनीकी सहायता के नाम पर शुरू हुई बातचीत को कथित तौर पर वित्तीय धोखाधड़ी में बदल दिया जाता था। बुजुर्गों के लिए ऐसी स्थिति में असली और नकली अधिकारियों के बीच अंतर करना मुश्किल हो सकता है, खासकर तब जब फोन करने वाला व्यक्ति तकनीकी शब्दों और आधिकारिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करे।

ठगी की रकम भारत से दूसरे देशों तक पहुंचाने की जांच

ईडी की जांच में कथित तौर पर ठगी से प्राप्त धन को अलग-अलग माध्यमों से स्थानांतरित किए जाने की जानकारी सामने आई है। एजेंसी के अनुसार, वेस्टर्न यूनियन और मनीग्राम जैसी अंतरराष्ट्रीय मनी ट्रांसफर सेवाओं के साथ-साथ हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल करके धन भारत, बांग्लादेश और थाईलैंड तक भेजा गया।

इस पहलू ने मामले को केवल स्थानीय साइबर अपराध तक सीमित नहीं रहने दिया। इसमें कथित तौर पर अलग-अलग स्थानों पर मौजूद लोगों, कंपनियों और धन हस्तांतरण के माध्यमों की भूमिका की जांच आवश्यक हो गई।

हालांकि, किसी देश में धन भेजे जाने की जानकारी अपने आप में वहां के हर व्यक्ति या संस्था की संलिप्तता साबित नहीं करती। संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और धन के वास्तविक स्रोत का निर्धारण जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होगा।

सात करोड़ रुपये की कथित अपराध से अर्जित आय

ईडी के मुताबिक, मुख्य आरोपी अनिक दत्ता ने एक अन्य आरोपी के साथ मिलकर इस कथित तरीके से करीब सात करोड़ रुपये की अपराध से अर्जित आय जुटाई। इसी मामले में एजेंसी ने 3.72 करोड़ रुपये की संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क करने की कार्रवाई की है।

कथित अपराध से अर्जित आय

₹7 करोड़

अस्थायी रूप से कुर्क संपत्ति

₹3.72 करोड़

कुर्क संपत्तियों में कोलकाता का फ्लैट और भूखंड, बैंक खातों में जमा रकम तथा बीमा पॉलिसियां शामिल हैं।

यहां यह समझना जरूरी है कि सात करोड़ रुपये की कथित अपराध से अर्जित आय और 3.72 करोड़ रुपये की कुर्क संपत्ति दो अलग-अलग आंकड़े हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बाकी रकम का पूरा हिसाब मिल चुका है या सभी पीड़ितों को उनकी धनराशि वापस कर दी गई है।

गोरखपुर साइबर थाने की FIR से शुरू हुई ईडी की जांच

इस मामले में ईडी ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर और दाखिल आरोपपत्र के आधार पर धन शोधन की जांच शुरू की थी। मामले में अनिक दत्ता, आकाश गुप्ता, आदित्य मिश्रा और अन्य लोगों के नाम सामने आए हैं।

ईडी के प्रयागराज स्थित इलाहाबाद उप-क्षेत्रीय कार्यालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत अनंतिम कुर्की आदेश जारी किया। इस कार्रवाई का उद्देश्य कथित अपराध से अर्जित संपत्तियों को जांच के दौरान बेचने या अन्य तरीके से हस्तांतरित किए जाने से रोकना है।

ध्यान देने वाली बात: संपत्ति की अनंतिम कुर्की अंतिम दोषसिद्धि नहीं है। मामले में आरोपियों की जिम्मेदारी और संपत्तियों के कथित अपराध से संबंध का अंतिम निर्धारण कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होगा।

साइबर ठगी से बचने के लिए क्या सावधानी जरूरी है?

इस मामले से आम लोगों के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण सबक सामने आते हैं:

  • किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर अपने कंप्यूटर या मोबाइल का रिमोट एक्सेस न दें।
  • इंटरनेट सेवा या बैंकिंग समस्या के नाम पर फोन करने वाले व्यक्ति की पहचान स्वतंत्र रूप से सत्यापित करें।
  • कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, बैंक या सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पैसे ट्रांसफर करने को कहे, तो पहले संबंधित संस्था के आधिकारिक माध्यम से पुष्टि करें।
  • बैंकिंग पासवर्ड, ओटीपी और अन्य गोपनीय जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा न करें।
  • यदि साइबर ठगी हो जाए, तो भारत में तुरंत साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।

आगे की जांच पर रहेगी नजर

रांची और गोरखपुर से संचालित कथित फर्जी कॉल सेंटरों से जुड़े इस मामले में ईडी की कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी और उससे अर्जित धन की जांच को महत्वपूर्ण मोड़ दिया है। करीब 3.72 करोड़ रुपये की संपत्ति की अस्थायी कुर्की के बाद अब कथित धन शोधन के रास्तों, संपत्तियों के स्रोत और मामले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका जैसे पहलू अहम रहेंगे।

फिलहाल, जांच एजेंसी के सामने चुनौती कथित अपराध से अर्जित धन और उससे जुड़ी संपत्तियों का पूरा वित्तीय ब्योरा स्थापित करने की है। मामले का अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।

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